
जुड़शीतल के दिन माता-पिता, बड़े-बुजुर्ग सिर पर जल डालकर देते ‘जुड़ायल रहु’ का आशीर्वाद : प्रो. मुनेश्वर यादव
मधुबनी- 08 अप्रैल। प्रो. मुनेश्वर यादव ने कहा कि मिथिला की लोकपर्व जुड़शीतल के दिन बचपन में माता-पिता, बड़े-बुजुर्ग सिर पर चुल्लू से पानी डाल ‘जुड़ायल रहु’ का आशीर्वाद देते थे। यह परंपरा आज भी बरकरार है। इस तरह माता-पिता, बड़े-बुजुर्गों का आशीष बडा फलदायी होता है। हरेक साल अप्रैल में होने वाले जुड़शीतल प्रकृति की सेवा का संदेश देता है।
इस दिन धुरखेल की परंपरा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग नदी, तालाब, कुआं व अन्य जलस्रोतों के पास एकत्रित होकर एक-दूसरे पर जल के साथ ही तलहटी में जमे कीचड़ को फेंककर लोग धुरखेल का आनंद उठाते हैं। कुआं तालाब, मटका और पानी टंकी जैसे जलस्रोतों तक की सफाई होती है। पेड़-पौधों को पानी दिया जाता है।प्रो. यादव ने कहा कि जुड़शीतल के दिन घर का चूल्हा नहीं जलता है। चूल्हे को विराम देकर वातावरण को गर्म होने से रोकने की कोशिश होती है। आज के दिन का भोजन एक दिन पूर्व सतूआन की रात्रि में तैयार कर लिया है। भोजन में तरह-तरह के व्यंजनों के साथ चना बेसन और दही से तैयार कढ़ी जरुर होता है।
जुडशीतल के दिन मधुबनी शहर के महाराजगंज के शीतला माता मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। प्रो. यादव ने बताया कि जुड़शीतल के दिन पितरों के लिए जल से भरे मिट्टी के पात्र लटकाए जाते हैं। छिद्र वाले मिट्टी के पात्र से समाधि पर जल का प्रवाह होता है। गर्मी के आगमन से वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। पौधों में जल की मात्रा कम हो जाती है।



