बिहार

‘महामहोपाध्याय पं. राजेन्द्र शास्त्री ‘पाण्डेय’ स्मृति सम्मान’ से अलंकृत मधुबनी के डा. राजनाथ झा

मधुबनी- 27 फरवरी। जिले के दीप निवासी तथा ज्योर्तिवेद विज्ञान संस्थान, पटना के निदेशक डॉ. राजनाथ झा को जयपुर में आयोजित ‘वेदामृतम्’ महाधिवेशन में प्रतिष्ठित ‘महामहोपाध्याय पं. राजेन्द्र शास्त्री ‘पाण्डेय’ (राजकोट वाले) स्मृति सम्मान’ से अलंकृत किया गया। यह अलंकरण डॉ. झा द्वारा प्रस्तुत शोधव्याख्यान ‘ज्योतिष विज्ञान : वैदिक काल से आधुनिक परिवेश तक एक वैज्ञानिक विरासत’ के लिए प्रदान किया गया। डा. झा ने ज्योतिष को अंधविश्वास या भाग्यवाद से पृथक करते हुए उसे गणित, खगोल एवं प्रकृति विज्ञान पर आधारित भारतीय ज्ञानपरंपरा के रूप में स्थापित किया। डॉ. झा ने स्पष्ट किया कि भारतीय ज्योतिष का सिद्धांत पक्ष वस्तुतः प्राचीन खगोल विज्ञान का विकसित रूप है। वेदांग ज्योतिष से लेकर सूर्य सिद्धांत तक ग्रहों की गति, अयन, नक्षत्र मंडल, कालगणना, ग्रहण-निर्णय और पृथ्वी की परिधि संबंधी गणनाएं अत्यंत सूक्ष्म एवं गणितीय आधार पर प्रस्तुत की गई हैं। पृथ्वी की परिधि का प्राचीन उल्लेख आधुनिक माप (लगभग 40,000 किमी) के समीप पाया जाना भारतीय गणितीय दक्षता का प्रमाण है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सूर्य ऊर्जा का मूल स्रोत है, चंद्रमा ज्वार-भाटा को प्रभावित करता है सौर ज्वालाएं पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन उत्पन्न करती हैं। यह तथ्य आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान द्वारा भी स्वीकार किए गए हैं। राहु और केतु को खगोल विज्ञान में ‘लूनर नोड्स’ के रूप में समझा जाता है, जो सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की खगोलीय प्रक्रिया का आधार हैं।

पंचतत्व सिद्धांत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को उन्होंने आधुनिक भौतिक अवस्थाओं (सॉलिड, लिक्विड, गैस, प्लाज़्मा और स्पेस) के तुलनात्मक संदर्भ में रखते हुए बताया कि प्राचीन भारतीय चिंतन प्रकृति के प्रत्यक्ष अवलोकन और अनुभवजन्य ज्ञान पर आधारित था। कृषि एवं ऋतु विज्ञान के संदर्भ में उन्होंने वराहमिहिर कृत बृहत्संहिता का उल्लेख करते हुए वर्षा, पवन दिशा, मेघोत्पत्ति एवं नक्षत्राधारित कृषि संकेतों की वैज्ञानिक उपयोगिता पर प्रकाश डाला। साथ ही महर्षि पराशर, बिहार के दैवज्ञ आर्यभट्ट एवं भास्कराचार्य के योगदान को भारतीय ज्योतिषीय-गणितीय परंपरा की आधारशिला बताया। डॉ. झा ने कहा कि ज्योतिष के समक्ष दो अतिवाद उपस्थित हैं।अंधस्वीकृति और अंधअस्वीकृति। ज्योतिषीय सिद्धांतों का परीक्षण डबल-ब्लाइंड पद्धति, सांख्यिकीय विश्लेषण, डेटा साइंस एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुसंधान के माध्यम से किया जाना चाहिए। लाखों जन्मपत्रियों के डेटा विश्लेषण से सहसंबंधों की वैज्ञानिक पड़ताल संभव है, जिससे पारंपरिक ज्ञान का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन हो सके। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों के डिजिटलीकरण, वेधशालाओं के पुनरुद्धार, विश्वविद्यालयों में अंतःविषयक शोध केंद्रों की स्थापना तथा आधुनिक खगोल विज्ञान के साथ समन्वय को समय की आवश्यकता बताया। डॉ. झा ने कहा कि यह अलंकरण उनके व्यक्तिगत प्रयासों से अधिक भारतीय वेद, ज्योतिष, वास्तु एवं सनातन ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन के प्रति सतत साधना का प्रतीक है।

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