
स्वामी सहजानंद जिम्मेदारी प्रथा के खिलाफ आखरी दम तक लड़ते रहेः MLC सर्वेश
मधुबनी-26 जून। बासोपट्टी प्रखंड क्षेत्र के गिरिजा कल्याणेश्वर महाविद्यालय परिसर में रविवार को श्रीमतपरमहंस परिब्राजकाचार्य शंकर रूप दण्डि स्वामी सहजानन्द सरस्वती की 71वीं पुण्यतिथि पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि विधान पार्षद सर्वेश कुमार, नागेश्वर पाण्डेय, राजपा के जिलाध्यक्ष रंजीत ठाकुर,भाजपा पूर्व जिला अध्यक्ष भोगेन्द्र ठाकुर,रतनेशवर ठाकुर, प्रचार्य सुधिर ठाकुर सहित अन्य ने दीप प्रज्वलित कर किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सांस्कृतिक कार्यक्रम उद्घोषक अनू ठाकुर, गायक राजा बाबू, प्रीति ठाकुर,पलक मिश्रा ने अपने गायनसे सबका मनमुग्ध कर दिया। प्रचार्य सुधीर ठाकुर ने कहा कि जिम्मेदारी प्रथा के खिलाफ लड़ते हुए स्वामी सहजानंद सरस्वतीजी 25 जून 1950 को मुजफ्फरपुर में महाप्रयाण कर गए।
स्वामी सहजानंद सरस्वती को संन्यास के बाद काशी में ही चुनौती मिली थी। स्वामी सहजानंद को भारत में किसान आंदोलन के जनक थे। विधान पार्षद सर्वेश कुमार ने कहा कि जिम्मेदारी प्रथा के खिलाफ लड़ते हुए स्वामी जी 25 जून 1950 को मुजफ्फरपुर में महाप्रयाण कर गए। आजादी मिलने के साथ ही सरकार ने कानून बनाकर जिम्मेदारी राज को खत्म कर दिया। शंकराचार्य संप्रदाय के दशनामी संन्यासी अखाड़े के दंडी संन्यासी थे। स्वामीजी के बचपन का नाम नौरंग राय था। उनके पिता बेनी राय सामान्य किसान थे।
मेधावी नौरंग राय ने मिडिल परीक्षा में पूरे उत्तर प्रदेश में छठा स्थान प्राप्त किया। सरकार ने छात्रवृत्ति दी एवं पढ़ाई के दौरान ही उनका मन अध्यात्म में रमने लगा। घर वालों ने बच्चे की स्थिति भांप कर शादी करा दी। संयोग ऐसा रहा कि पत्नी एक साल बाद ही चल बसीं। परिजनों ने दूसरी शादी की बात निकाली, तो वे भाग कर काशी चले आए। काशी में आदि शंकराचार्य की परंपरा के स्वामी अच्युतानन्द से दीक्षा लेकर संन्यासी बन गए। बाद के दो वर्ष उन्होंने तीर्थों के भ्रमण और गुरु की खोज में बिताया। 1909 में पुनः काशी पहुंचकर दंडी स्वामी अद्वैतानंद से दीक्षा ग्रहणकर दंड प्राप्त किया और दंडी स्वामी सहजानंद सरस्वती बने। इसी दौरान उन्हें काशी में समाज की एक और कड़वी सच्चाई से सामना हुआ। दरअसल काशी के कुछ पंडितों ने उनके संन्यास पर सवाल उठा दिया। उनका कहना था कि ब्राह्मणेतर जातियों को दंड धारण करने का अधिकार नहीं है। स्वामी सहजानंद ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और विभिन्न मंचों पर शास्त्रार्थ कर ये प्रमाणित किया कि हर योग्य व्यक्ति संन्यास ग्रहण करने की पात्रता रखता है। काफी शोध के बाद उन्होंने भूमिहार-ब्राह्मण परिचय नामक ग्रंथ लिखा जो आगे चलकर ब्रह्मर्षि वंश विस्तर के नाम से सामने आया। संन्यास के उपरांत उन्होंने काशी एवं दरभंगा में कई वर्षो तक संस्कृत साहित्य,व्याकरण,न्याय एवं मीमांसा का गहन अध्ययन किया। साथ-साथ देश की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का अध्ययन भी करते रहे। मौके पर नीलाम्बर ठाकुर,मनोरंजन पाण्डेय,रूपेश ठाकुर,राजू शर्मा समेत दर्जनों कार्यकर्ताएं मौजूद थे।



