
योग साधना से मानव मात्र का होगा कल्याण: प्रो. मुरली
दरभंगा- 15 सितंबर। योग भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है । प्राचीन काल में ही इसके महत्व को समझकर इसे भारतीय ऋषि मुनियों ने अपने जीवन शैली का अंग बना लिया। इस पर गहन विचार विमर्श करते हुए महर्षि पतंजलि ने आज से लगभग तीन हजार साल पहले योगसूत्र का निर्माण किया। इसी कारण आज भी पूरे विश्व में योग का अद्भुत प्रचार प्रसार हो रहा है। उक्त बातें सी.एम. कॉलेज में हुए पातंजल योगसूत्र (व्यासभाष्य) के विभूति पाद से संबंधित दस दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन के अवसर पर श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति श्री मुरली मनोहर पाठक ने कही। आभासी रूप से मुख्य अतिथि के रूप में जुड़े प्रो.पाठक ने योग एवं योगसूत्र के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रधानाचार्य डॉ. अनिल कुमार मंडल ने वर्तमान समय में तनाव पूर्ण जीवन से मुक्ति दिलाने हेतु योग को सर्वोत्तम साधन होने पर बल दिया । उन्होंने कहा आज का समाज यदि अपने व्यस्ततम जीवन शैली में योग के लिए कुछ समय प्रतिदिन दे, तो निश्चित रूप से जीवन में किसी प्रकार का तनाव नहीं रहेगा। विषय प्रवेश करवाते हुए सांख्ययोग विभागाध्यक्ष प्रो. मार्कण्डेय नाथ तिवारी ने कहा कि योग की क्रिया में सैद्धांतिक पक्ष को जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए योगसूत्र के अक्षरश: अध्यापन हेतु इस कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है।
इस कार्यशाला में अध्यापन हेतु दस दिनों तक भारतवर्ष के सुविख्यात विद्वान लोग उपस्थित होंगे। जिसका साक्षात लाभ इसमें जुड़े प्रतिभागियों को मिलेगा। लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के दर्शन पीठाध्यक्ष प्रो. केदार प्रसाद परोहा ने कार्यशाला की पूर्वपीठिका प्रस्तुत करते हुए कार्यशाला की सफलता हेतु अग्रिम शुभकामना दी। कार्यशाला हेतु संयुक्त तत्वावधान में जुड़े श्रीनाथ संस्कृत महाविद्यालय,कुशीनगर के महामंत्री श्री गंगेश्वर पांडेय ने कार्यशाला के प्रति सदाशयता प्रकट की । वैदिक ध्वनि के साथ दीप प्रज्वलन एवं माता सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के साथ प्रारम्भ हुए कार्यक्रम में स्वागतभाषण डॉ. मोहन लाल शर्मा ने किया।
कार्यक्रम का सुंदर एवं सफल संचालन संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. संजीत कुमार झा ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राजेश चतुर्वेदी ने किया। सामूहिक शान्ति पाठ के साथ कार्यशाला का उद्घाटन सत्र संपन्न हुआ। इस सत्र में नब्बे से अधिक प्रतिभागी आभासी रूप से जुड़े थे तथा भौतिक रूप से डॉ. प्रभात चौधरी,प्रो.आलोक रंजन तिवारी,डॉ.आशीष बरियार,प्रो.अमृत कुमार झा,डॉ. दिवाकर सिंह, डॉ. शशांक शुक्ला,डॉ. दिव्या शर्मा,डॉ. शशिभूषण भट्ट,डॉ. विजयसेन पांडेय,अमित कुमार झा एवं संस्कृत विभागीय छात्र छात्राएं आदि समुपस्थित हुए।



