
मॉब लिंचिंग के खिलाफ क़ानून लाने की जरूरतः जमात-ए-इस्लामी हिन्द
नई दिल्ली- 01 जनवरी। हमारे देश में मुसलमानों और दलितों के खिलाफ घृणा,अपराध और लिंचिंग के मामलों में हाल के वर्षों में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। असामाजिक और आपराधिक तत्वों के साथ कुछ सुसंगठित समूह इतने साहसिक हो गए हैं कि दिन के उजाले में लिंचिंग को अंजाम देते हैं और उसे फिल्मा कर सोशल मीडिया पर वायरल भी करते हैं। ये लोग बेखौफ होकर ऐसा करते हैं, क्योंकि पुलिस उनके खिलाफ कोई गंभीर कार्रवाई नहीं करती है। जमात-ए-इस्लामी हिंद झारखंड सरकार के जरिए ’भीड़ हिंसा रोकथाम और मॉब लिंचिंग विधेयक 2021’ के पारित किए जाने की सराहना करती है। यह बातें जमात इस्लामी हिन्द के उपाध्यक्ष प्रोफेसर मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने आज जमात मुख्यालय में ऑनलाइन आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में कही।
उन्होंने बताया कि राजस्थान और पश्चिम बंगाल के बाद झारखंड भारत का तीसरा राज्य है, जिसने मॉब लिंचिंग के खिलाफ कानून पारित किया है। उनका कहना है कि देश के अन्य राज्यों में भी मॉब लिंचिंग के खिलाफ क़ानून लाने की आवश्यकता है। जो लोग हिंसा और क़त्लेआम की बात करते हैं, वे धर्म के सच्चे प्रतिनिधि नहीं हैं। जमात महसूस करती है कि अपने नागरिकों के जीवन की रक्षा करना केंद्र और राज्य सरकारों का कर्तव्य है। इसलिए उन्हें आगे बढ़ना चाहिए और इसी तरह के ’मॉब लिंचिंग रोकथाम’ विधेयकों को जल्दी से पारित किया जाना चाहिए।
प्रोफेसर मोहम्मद सलीम इंजीनियर ने कहा कि जमात कुछ सुव्यवस्थित समूहों द्वारा खुले तौर पर एक विशेष समुदाय को लक्षित करने वाले घृणास्पद भाषण देने पर गंभीर चिंता व्यक्त करती है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि नफरत की यह राजनीति वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए की जाती है ताकि सरकार और सत्ता के विकास प्रदर्शन से लोगों का ध्यान अन्य भावनात्मक मुद्दों पर स्थानांतरित हो जाए।
उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए शादी की कानूनी उम्र बढ़ाकर 21 साल करने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि माताओं और नवजात शिशुओं के खराब स्वास्थ्य का कारण गरीबी और कुपोषण है। यदि खराब स्वास्थ्य देखभाल और गरीबी इतने उच्च स्तर पर बनी रहती है, तो आयु सीमा बढ़ाने से स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह प्रकृति के नियम के खिलाफ है। इसकी वजह से मनोवैज्ञानिक, चिकित्सा, सामाजिक और मानवाधिकार जैसी समस्याएं जन्म लेंगीं। अगर यह प्रस्ताव कानून का रूप लेता है, तो इससे आदिवासी समुदायों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और कानून प्रवर्तन मशीनरी उन्हें और परेशान करेगी।
देश के विधानसभा चुनावों और कोविड वायरस से सम्बंधित पूछे गए सवाल के जवाब में प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा कि उत्तर प्रदेश में आगामी चुनाव में विशाल राजनीतिक रैलियां देखने को मिल रही हैं। जमात महसूस करती है कि भाजपा सहित चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों को स्वेच्छा से इन बेहद महंगी और जोखिम भरी राजनीतिक रैलियों के आयोजन से बचना चाहिए।



