
मधुबनी जिले में शिक्षकों का प्रतिनियोजन रद्द, DEO ने जारी किया आदेश
मधुबनी- 18 अक्टुबर। जिले में शिक्षकों का प्रतिनियोजन का खेल अनवरत जारी रहा है। जब भी मामला उठता है, तो शिक्षकों को प्रतिनियोजन से हटाने का आदेश जारी कर दिया जाता है। परंतू जमीनी स्तर पर इन शिक्षकों को रखे ही रह जाते हैं। जिले के लगभग सभी कार्यालयों में यह खेल जारी है। डीईओ कार्यालय पर महेश्वर कामत के अनशन के बाद शिक्षा विभाग हरकत में आया। तथा कार्यालय आदेश जारी कर जिले में गैर शैक्षणिक कार्यो में लगे सभी शिक्षकों के प्रतिनियोजन रद्द कर दिया गया है।
डीईओ दिनेश चोधरी द्वारा जारी आदेश में बताया गया है कि डीईओ कार्यालय, शिक्षा विभाग के सभी डीपीओ कार्यालय,सभी अनुमंडल कार्यालय, प्रखंड एवं अंचल के साथ जिले के अन्य विभागों में प्रतिनियोजित सभी शिक्षकों के प्रतिनियोजन को रद्द किया जाता है। प्रतिनियोजन को विखंडित करते हुए विद्यालय में योगदान के लिए विरमित किया जाता है। इन सभी शिक्षकों को प्रतिनियोजित कार्यालय से स्वतरू विरमित समझते हुए अगले कार्यदिवस को विद्यालय में योगदान सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया है।
वहीं डीईओ दिनेश चोधरी ने अपने कार्यालय में पांच शिक्षकों को छह जुलाई को प्रतिनियोजित किया था। जिसमें राजनगर कुसमौल के फुलदेव यादव,मनोज कुमार,गोविन्द रंजन,देवेन्द्र प्रताप सिंह एवं शचीन्द्र कुमार झा शामिल हैं। ये सभी अपने स्कूलों में सहायक शिक्षक के पद पर पदस्थापित हैं। इसी तरह जिले में 1200 से अधिक शिक्षक विभिन्न कार्यालयों में प्रतिनियोजन पर हैं। कई तो ऐसे शिक्षक हैं, जो कई सालों से प्रतिनयोजन पर हैं। शिक्षक नियोजन के दौरान बिना कार्य भी जिला परिषद में कई महीने इन शिक्षकों को प्रतिनियोजित रखा जाता है। इस तरह जहां यदि कभी जरूरत हुई, तो शिक्षकों को प्रतिनियोजित किया गया, उन्हें उसी तरह से छोड़ दिया जाता है।
इधर विभिन्न कार्यालयों में शिक्षकों के प्रतिनियोजन से उन कार्यालयों में कार्यरत कर्मियों की योग्यता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इन शिक्षकों के प्रतिनियोजन के बाद से अधिकारियों के निकटतर उन्हें ही माना जाता है और संबंधित कर्मी सेकेंड लाइन में रह जाते हैं। अनशन के दौरान रंधीर कुमार एवं रंजन साह ने बताया कि प्रतिनियोजित शिक्षकों को अवैध वसूली का माध्यम इन कार्यालयों में बनाया जाता है। कर्मी जो नहीं कर सकते उन कार्यो में इन प्रतिनियोजित शिक्षकों के माध्यम से सरलता से पदाधिकारी करा लेते हैं। क्योंकि प्रतिनियोजित शिक्षकों का दायित्व नहीं रहता और मामला फंसने पर कर्मी चपेट में सहजता पूर्वक आ जाते हैं।



