
भारतीय ‘रिलीजन’ स्वभाव से हिंदू है: मोहन भागवत
नागपुर- 06 फरवरी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि हिंदुत्व कोई रिलीजन नहीं है। धर्म की व्याख्या बहुत व्यापक होती है। इसे रिलीजन जैसे शब्दों के जरिए परिभाषित नहीं किया जा सकता। भागवत ने बताया कि भारत के जितने भी रिलीजन है, वह स्वभाव से हिंदू हैं।
नागपुर में आयोजित एक निजी संस्थान के कार्यक्रम मे सम्मिलित होते हुए सरसंघचालक ने “हिंदुत्व और राष्ट्रीय एकात्मता” विषय पर आयोजित व्याख्यान में मार्गदर्शन करते हुए कहा कि हिंदुत्व और सेक्युलॅरिज्म में कोई अंतर नहीं है। नतीजतन कार्यक्रम का शीर्षक “ हिंदुत्व यानी राष्ट्रीय एकात्मता” ऐसा होना चाहिए था। सरसंघचालक ने कहा कि हिंदुत्व कोई ‘इज्म’ नही है। हिंदुत्व का सीधा अंग्रेजी भाषांतर ‘हिंदुनेस’ होता है। डॉ. भागवत ने बताया कि रिलीजन यानी धर्म नहीं है। धर्म एक बहुत विशाल कल्पना है। हमारे देश में कोई हिंदू रिलीजन नहीं है। सरसंघचालक के अनुसार अपने देश में अनेक रिलीजन्स है और वह हिंदू स्वभाव के रिलीजन्स हैं। उन सभी रिलीजन का स्वतंत्र अस्तित्व मान्य किया जाता है लेकिन उन सबका स्वभाव मेरा भी सही-तुम्हारा भी सही,मिलजुल कर चलो,इस तरह है। भागवत ने कहा कि,भारत से निकली हुई सभी प्रकार की विचारधाराएं सर्व समावेशक है।
संविधान से पहले भी देश सेक्युलर था—
भागवत ने कहा कि भारतीय संविधान में डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने सेक्युलर शब्द का प्रयोग नहीं किया था। यह शब्द संविधान के प्रियांबल में बाद में जोड़ा गया। यही संविधान में सेक्युलर शब्द जोड़ा नहीं जाता तब भी यह देश सेक्युलर ही होता। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी के साथ हुई चर्चा के संस्मरणों को साझा करते हुए सरसंघचालक ने बताया कि स्व. प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि भारत को अमेरिका से प्रजातंत्र का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। यदि इस देश के संविधान में सेक्युलॅरिज्म शब्द नहीं होता तब भी देश सेक्युलर ही कहलाता क्योंकि भारतीय समाज और संस्कृति में सेक्युलॅरिज्म 5 हजार वर्षो से रचा बसा है।
इस अवसर पर सरसंघचालक ने खेद जताया कि संघ के कार्यक्रम में सम्मिलित होने की वजह से स्व. प्रणब मुखर्जी को हिंदुत्ववादी कहा गया। मुखर्जी के बारे में हिंदुत्ववादी शब्द का जिक्र आलोचना की तरह किया गया। डॉ. भागवत ने कहा कि हिंदुत्व आलोचना का विषय नहीं है। सरसंघचालक ने बताया कि पहले के जमाने में अंग्रेजों ने भारतीय समाज को गुलाम बनाने के लिए साजिश रची थीं। अंग्रेज इस देश में अपने जैसे काले अंग्रेज और गुलामी की मानसिकता को बढ़वा देने वाली व्यवस्था विकसित करना चाहते थे। सरसंघचालक ने आगाह किया कि अंग्रेजी शासन काल में किया गया खिलवाड़ भारत के साथ दुबारा हो रहा है। सरसंघचालक ने कहा कि विश्व कि कुछ शक्तियां भारत को उभरने नहीं देना चाहती हैं। नतीजतन,भारतीय समाज में भ्रम फैले और आपसी टकराव हो, इसलिए ऐसी चीजों को जान-बूझकर बढ़ावा दिया जाता है।
धर्म संसद की बातें समर्थनीय नहीं—
इस अवसर पर भागवत ने कहा कि, बीते दिनों हुई धर्म संसद की कुछ बातों की आलोचना हो रही है। अनुचित वक्तव्य का कोई समर्थन नहीं हो सकता। बतौर सरसंघचालक यदि कोई व्यक्ति तैश में आ कर कोई अनुचित वक्तव्य करे तो उसे धर्म का अभिप्राय नहीं कहा जा सकता। ऐसी चीजें समर्थनीय नहीं होतीं, ना ही देश में कोई उनका समर्थन करता है।



