
बिहार में समाजवादी विचारधारा संकट में है, जो भविष्य के लिए चिंता का विषय बन गया हैः राम सुदिष्ट यादव
मधुबनी- 24 जून। बिहार कभी मजबूत समाजवादी धरती रही थी। यहां लगभग 17 वर्षों से जदयू-भाजपा की सरकार बिहार में चल रही है। इस दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बहुत हदतक अपने विचार से भाजपा के संग शासन करती रही है। परंतू भाजपा भी लम्बे समय तक बिहार की शासन में नीतीश कुमार के साथ रहकर दक्षिण पंथी विचारधारा को मजबूत करते हुए तिसरे नम्बर की भाजपा आज दुसरे नंबर की पार्टी बनकर सत्ता भोग रही है। इस सत्ता शासन के दौर में सबसे ज्यादा समाजवादी विचारधारा को नुक्सान हुआ है। उक्त बातें समाजवादी विचारक राम सुदिष्ट यादव ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहीं। उन्होने कहा कि जनता के मुद्दों की राजनीति एवं मुद्दों के आधार पर वोट मांगने की संस्कृति का लोप हो गया है। अब बिहार में समाजवादी विचारधारा सिर्फ जनता के बीच भाषण देने एवं समाजवादी चिंतकों, समाज सुधारकों, नेताओं के नाम गिनाने तक सीमित हो गया है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और समर्थकों में समाजवादी विचारधारा के नाम पर जनता की सामूहिक सामाजिक मुद्दों पर संघर्ष करने की परिपाटी प्रायः समाप्त हो गई है। इस प्रकार समाजवादी विचारधारा बिहार में कमजोर हुई है। अब व्यक्तिगत पद,प्रतिष्ठा,लाभ हासिल करने की प्रवृत्ति अधिक से अधिक बढ़ गई है। यही कारण है कि समाजवादी विचारधारा के शेष लोग आपस में अधिक करते हैं, समाजवादी घर बनाते हैं और आपस में अहम की टकराहट में घर को उजार कर ध्वस्त करने में भी अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप दक्षिण पंथी,फासिस्टवादी,गैर सैकुलर शक्ति बीजेपी अपनी पांव पसारती जा रही है। आज बीजेपी नम्बर दो की पार्टी बन गई है, जो भविष्य के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। बिहार में पुनः सोशलिस्ट, प्रजा सोशलिस्ट की तरह कैडर वेश समाजवादियों का संगठन प्रदेश से गांव स्तर पर खड़ा करना होगा, जो समाजवादी विचारधारा से बोल-चाल, रहन-सहन,कार्यकर्ताओं की सामूहिक बातें को प्राथमिकता देने की संस्कृति को विकसित करना चाहिए। तब ही हमलोग समाजवादी धरती को बिहार में मजबूत कर पायेंगे। जमीनी स्तर पर गांव कस्बों में समाजवादी विचारधारा को मजबूत करने वाले कार्यकर्ताओं को अहमियत देने होंगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रतिनिधि तो जनता के सेवक होते है। परंतू इन दिनों समाजवादी धारा के भी प्रतिनिधि गण अपने आपको पावर युक्त एवं धौंस जमाने वाले की भूमिका में रहने लगे हैं। वर्तमान दौर में बिहार में समाजवादी विचारधारा की पार्टी कहलाने वाली किसी भी राजनीतिक पार्टी को जिला स्तर पर स्थाई कार्यालय नहीं है और पार्टी नेतृत्व रखना भी नहीं चाहते हैं। यह अपरिपक्व विचारधारा वाली पार्टी का प्रथम लक्षण दर्शाता है। अनुमंडल, प्रखंड एवं पंचायत में स्थाई कार्यालय तो बहुत दूर की बातें होंगी। वर्तमान दौर में विचारधारा और सामूहिक मुद्दों के नाम पर गोलबंदी नहीं हो पा रही है। बल्कि अब जाति के नाम पर गोलबंदी की संस्कृति शुरू हो चुकी है। इससे जातिय हितों की बातें सरे आम होने लगी है। इससे तो व्यक्तिगत तुष्टिकरण की संस्कृति की बढ़ावा अधिक होने की संभावना बढ़ेगी। वैसे समाज में जिस वर्ग में शिक्षा अधिक है, उस वर्ग में सरकारी स्तर पर उतना ही अधिक जातिवादी विचारधारा हावी है।



