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बिहार में पहली बार बेगूसराय के अनीश ने उपजाया स्वास्थ्य के लिए रामबाण सोना-मोती गेंहू

बेगूसराय- 23 मई। खान-पान के कारण स्वास्थ्य में तेजी से आए गिरावट के बाद लोग अब पुराने जमाने के अनाज की ओर आकर्षित हो रहे हैं। केंद्र सरकार पुराने अनाज उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ-साथ रासायनिक खाद मुक्त खेती को बढ़ावा देने के लिए भी लगातार प्रयास कर रही है। देश के विभिन्न हिस्सों की तरह बेगूसराय में भी जैविक कॉरिडर बनाए गए हैं। लेकिन यहां सिर्फ जैविक कॉरिडोर के तहत ही नहीं, बल्कि इससे हट के भी किसान पुराने जमाने के अनाजों के किस्म का उत्पादन कर रहे हैं। जिससे ना सिर्फ उनके आय को आगे बढ़ने के स्रोत में वृद्धि हो रही है, बल्कि जानकारी पाकर दूरदराज से भी किसान आकर देख रहे हैं, सीख रहे हैं।

ऐसा ही कमाल एक बार फिर किया है जिले के छोड़ाही प्रखंड क्षेत्र स्थित एक एकंबा के किसान अनीश कुमार ने। लगातार नई खेती कर रहे अनीश कुमार ने इस वर्ष एक एकड़ में हड़प्पा मोहनजोदड़ो काल में उगाए जाने वाले वाले गेहूं का सोना-मोती लगाया तथा दस क्विंटल की उपज हुई। बिहार में पहली बार बिहार में उपजाए गए किस्म प्रकृति द्वारा उत्पन्न गेहूं का एकमात्र किस्म है, जिसमें नेचुरल फोलिक एसिड पाया जाता है, साथ ही यह सुगर फ्री है जो डायबिटिक पेशेंट के लिए रामबाण साबित हो रहा है। अनीश ने बताया कि हरित क्रांति से पहले देश में गेहूं के कई देसी किस्म थे जो बदलते परिवेश के साथ-साथ विलुप्त होते जा रहे हैं। शुगर फ्री गेहूं सोना-मोती को पैगंबरी गेहूं भी कहा जाता है, इसके आटे का सेवन जो व्यक्ति कर रहे हैं और जिन्हें डायबिटीज है, इसके नियमित सेवन से इंसुलिन इंजेक्शन लेने वालों ने भी इंजेक्शन कम कर दिया है।

हड़प्पा काल के इस गेहूं को आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर ने सोना मोती नाम दिया है। दुनिया भर में सबसे प्राचीन किस्मों में से एक है, ऐसा माना जाता है यह किस्म चार हजार साल से अधिक पुरानी है। अनुमान है कि गेहूं की इस किस्म की उत्पत्ति मोहनजोदड़ो काल के आसपास हुई थी। अनीश ने बताया कि वैज्ञानिकों की राय में यह बेसहारा लोगों के लिए स्थापित आश्रय गृह में अब तक सुरक्षित रही है, उत्तरी भारत ने इसकी फसलों को हजारों वर्षों से संरक्षित किया गया है। यह परंपरागत रूप से प्रोटीन, मैग्नीशियम और आयरन से भरपूर माना जाता है। इसमें अन्य गेहूं की तुलना में कम ग्लूटेन वैल्यू भी है, जो ब्लड शुगर के स्तर को कम करने में मदद करता है, इसके साथ ही शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली बनाने में भी मदद करता है।

यह दुर्लभ देसी गेहूं है, हरित क्रांति से बहुत पहले गेहूं की कई प्राचीन देसी किसमें थी जो हजारों वर्षों से भारत में उगाई गई थी। कृषि विज्ञान की प्रयोगशाला में परीक्षण किया गया और पाया गया कि फोलिक एसिड किसी अन्य अनाज की तुलना में इसमें 12 प्रतिशत अधिक है, जबकि अन्य गेहूं में फोलिक एसिड होता ही नहीं है। स्वस्थ शरीर के लिए फॉलिक एसिड महत्वपूर्ण होता है। दिल का दौरा पड़ने जैसी कई प्रकार की बीमारियां रक्तचाप फोलिक एसिड की कमी के कारण होता है। उन्होंने बताया कि सोना मोती गेहूं पहली बार एक एकड़ में लगाया, जिसका परिणाम काफी संतोषप्रद है। देसी किस्मों की खासियत होती है कि इसमें किसी भी तरह का रासायनिक खाद और कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया जाता है। गेहूं की इस फसल को किसानों ने काफी सराहा है।

विलुप्त किस्म का गेहूं लगाए जाने की जानकारी पाकर पौधा संरक्षण पदाधिकारी श्वेता कुमारी एवं कृषि विज्ञान केंद्र के वरीय वैज्ञानिक डॉ. रामपाल ने भी फसल को खेत में आकर देखा तथा प्रशंसा की थी। अनीश कुमार ने बताया कि वर्तमान समय में गेहूं की सर्वाधिक उन्नतशील किस्म 2968 ज्यादातर किसान लगाने लगे हैं। दोनों की तुलना की जाए तो सोना मोती में प्रोटीन मात्रा-12.59, कार्बोहाइड्रेट-73.94, टोटल फैट-1.74, शुगर-1.29, ग्लाईमिक इंडेक्स-55, मिनिरल कंटेंट-1.8, फोलिक एसिड-3786 प्रतिशत पाया जाता है। जबकि इसके मुकाबले 2968 गेहूं में प्रोटीन-8.9, कार्बोहाइड्रेट्स-75.6, टोटल फैट-1.2, शुगर-1.3, मिनिरल कंटेंट-0.49, फोलिक एसिड-शून्य प्रतिशत पाया जाता है।

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