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ज्ञानवापी मस्जिद मामले में वाराणसी जिला जज कोर्ट का फैसला निराशाजनक और दुःखदायी है: मौलाना सैफुल्लाह रहमानी

नई दिल्ली- 12 सितंबर। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना ख़ालिद सैफ़ुल्लाह रहमानी ने अपने प्रेस नोट में कहा है कि ज्ञानवापी मस्जिद के संबंध में जिला जज कोर्ट का प्रारंभिक निर्णय निराशाजनक और दुःखदायी है। मौलाना रहमानी ने कहा कि 1991 ई0 में बाबरी मस्जिद विवाद के बीच संसद ने मंजूरी दी थी कि बाबरी मस्जिद को छोड़कर सभी धार्मिक स्थल 1947 ई0 में जिस स्थिति में थे उन्हें यथास्थिति में रखा जाएगा और इसके ख़िलाफ़ कोई विवाद मान्य नहीं होगा। फिर बाबरी मस्जिद मामले के फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 1991 ई0 में धार्मिक स्थलों से संबंधित क़ानून की पुष्टि की और इसे अनिवार्य घोषित कर दिया। लेकिन इसके बावजूद, जो लोग देश में घृणा परोसना चाहते हैं और जिन्हें इस देश की एकता की परवाह नहीं है उन्होंने बनारस में ज्ञानवापी मस्जिद का मुद्दा उठाया और अफ़सोस की बात है कि स्थानीय जिला जज कोर्ट ने 1991 ई0 के क़ानून की अनदेखी करते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया और अब यह दुःखदायी दौर भी सामने आ रहा है कि कोर्ट ने शुरू में हिंदू चरमपंथी समूह के दावे को स्वीकार कर लिया और उनके लिए रास्ता आसान बना दिया है, यह देश और क़ौम के लिए एक दर्दनाक बात है। इससे देश की एकता प्रभावित होगी,सामुदायिक सद्भाव को क्षति पहुंचेगी, उग्रवाद और हिंसा को मज़बूती मिलेगी और शहरों में क्लेश उत्पन्न होगा। सरकार को 1991 ई0 के क़ानून को पूरी ताक़त से लागू करना चाहिए,सभी पक्षों को इस क़ानून का पाबन्द बनाया जाए और ऐसी स्थिति उत्पन्न न होने दें कि अल्पसंख्यक न्याय व्यवस्था से निराश हो जाएं और महसूस करें कि उनके लिए न्याय के सभी दरवाज़े बंद हैं।

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