भारत

समाज खो रहा विवाह में आस्था,हिन्दू परंपरा बताती है विवाह सात जन्मों का संबंध

कठुआ- 15 दिसंबर। तलाक़ तलाक़ तलाक़ और फिर रिश्ता ख़त्म! टूट जाते है संबंध शब्दों से। जब रिश्ते काग़ज़ पर दस्तखत कर अपनाये जाते है तो कुछ शब्दों से टूटना भी लाज़मी है। हिन्दू परंपरा में भी अब इन शब्दों का चलन बढ़ गया है। शादियां टूटने लगी है। अदालत फैसला करने लगा है कि पति-पत्नी को साथ रहना है या नही! नही, तो फिर तलाक़ देना होगा। बहुत ढूढ़ा पर डाइवोर्स-तलाक़ का हिंदी शब्द ही नही मिला। डाइवोर्स अंग्रेजी और तलाक उर्दू शब्द है फिर हिंदी शब्द क्या है इसका? हिन्दू शादी तोड़ दे रहे, पति-पत्नी अलग रह रहे है पर इस हिंदू परंपरा में इस डिवोर्स या तलाक को क्या कहेंगे? आश्चर्य होगा,हमारी परंपरा में इन अंग्रेजी और उर्दू शब्द का कोई हिंदी शब्द है ही नही, क्योंकि हमारी हिन्दू परंपरा बताती है विवाह सात जन्मों का संबंध है।

हिन्दू परंपरा में विवाह का बंधन 7 जन्मों का साथ माना जाता है। अग्नि को साक्षी मान कर जब दाम्पत्य जीवन मे प्रवेश व्यक्ति करता है तो वो केवल फेरे नही है बल्कि अग्नि के सात फेरे सात वचनों के सूचक है। विवाह के बंधन को हमारी संस्कृति में पवित्र बंधन कहा गया है। विवाह की बात आती है तो आदर्श के रूप में हमेशा भगवान श्रीराम संग माता सीता का विवाह स्मरण में आता है। भले ही राजनीतिक दृष्टि से प्रभु श्रीराम का जीवन बहुत कठिन रहा हो पर उनके वैवाहिक जीवन में ऐसी सैकड़ो बाते है जिसे आज भी उदाहरण स्वरूप दिया जाता है, नये दाम्पत्य जीवन मे प्रवेश कर रहे जोड़ो को विशेषरूप से प्रभु श्रीराम के जीवन जैसा आचरण एवं व्यवहार करने की सलाह दी जाती है। इसलिए भी हम प्रभु श्रीराम को मर्यादापुरुषोत्तम कहते है।

हिन्दू विवाह पद्दति में हर रस्म के अपने मायने है उसके पीछे गहरी बात छिपी हुई है जिसे कभी जानने की कोशिश ही नही की हमने। आज चूंकि हम हिन्दू विवाह को पश्चिमी सभ्यता के चकाचौंध में इतना रंग दिया कि पता ही नही चला कि कब हम अपने परंपराओं से दूर हो गए। हमारी विवाह विधि स्वयं के लिए बोझ बन गई। पूर्ण विधि विधान से विवाह के लिए समय नही है। रस्मों के लिए समय नही है पर रुतबे को बताने के लिए छप्पनभोग की पूर्ण व्यवस्था है। क्या आपको पता है हमारे यहाँ रात्रि विवाह का कोई विचार ही नही था? अगर नही था तो फिर ये आम कैसे हो गया? रामायण- महाभारत जैसे ग्रंथ पढ़े होंगे अगर नही पढ़ा भी होगा तो कम से कम टीवी पर सोशल मीडिया में कुछ अंश जरूर देखा होगा। क्या कही भी विवाह रात्रि में देखा आपने? प्रभु श्रीराम का विवाह धनुष तोड़ने के बाद क्या रात्रि में हुआ? क्या अर्जुन का विवाह मछली की आँख मे तीर मारने के बाद रात्रि में हुआ? ऋषियों का विवाह, राजाओं का विवाह किसी का विवाह क्या आपके जानकारी में है कि रात्रि में हुआ? फिर ये हमारी हिन्दू परंपरा में कैसे समाहित हो गई?

मुगल भारत लूट की नीयत से आये। भारत की संपदा को लूटा, मंदिरों को तोड़ा, राज्यों पर कब्ज़े किये अधिपत्य जमाया। मुगल अपनी बेग़म और महिलाओं के साथ भारत नही आये थे चूंकि जब बसने लगे तो भारत की महिलाओं के साथ जबरन निगाह कर वंश को आगे बढ़ाने लगे थे। यहाँ के लोगो ने अपनी बहनों का विवाह मुगलों के डर से रात के अंधेरे में दूरदराज करना शुरू कर दिया और यही से रात्रि विवाह का ट्रेंड शुरू हुआ। आज हम डर से नही ख़ुशी से बिना जानकारी के उसी परंपरा का निर्वहन कर रहे है। विवाह का ट्रेंड ऐसा बदला की प्रीवेडिंग शूट के नाम पर समाज मे गंदगी परोस रहे है। कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर कुछ प्रीवेडिंग शूट की फोटो चल रही है। जहाँ अश्लीलता परोसा जा रहा है। जिसे हम कभी पाप मानते थे आज तो कल्चर है। फोटो के नाम पर दारू, सिगरेट का सेवन हो रहा। बेबी बम्प के नाम पर गर्भवती महिला लोकलज्जा को त्याग कर फोटोशूट करा रही है। ऐसा बिल्कुल भी नही है कि केवल और केवल महिलाओं का ही दोष है इसमें पुरूष और परिवार उनसे ज्यादा जिम्मेदार है। इन सब मे बॉलीवुड ने ज्यादा क्षति पहुँचाई है। फिल्मों के माध्यम में सीरियल के माध्यम में देश के हर घर मे जा बैठे, जो परोसा वो भारतीय परंपराओं में पश्चिम का मिश्रण था। जैसे तेल में पानी, बना कुछ नही लेकिन बर्बाद सब कर दिया। फिर न ही तेल किसी काम का न ही पानी। वैवाहिक रस्में भेंट चढ़ गए। उन रस्मों का कही मज़ाक बनाया तो कही रस्मो के मायने ही बदल दिए। जड़ तक आघात किया गया। गुरु-शिष्य जैसे पवित्र परंपरा को धीरे धीरे समाप्त कर दिया। इन विधर्मियों ने गुरु को शिष्य से या फिर शिष्य को गुरु से मोहब्बत हो जा रही है , हिन्दू परंपरा कुंठित परंपरा है, रस्मे रिवाज़ धोखा है, हर घर मे शकुनी है, हर घर मे मंथरा है, ऐसा दिखा दिखा कर नये पौध को सशंकित बना दिया। परिवार तोड़ दिए।

भारतीय मूल में विवाह केवल दो लोगो का मिलन नही है बल्कि दो परिवारों का मिलन है। पर आज देश की अदालतों में ऐसे लाखों केस दहेज़ के मिल जायेंगे। विचार करने की जरूरत है ये दहेजप्रथा कहाँ से आया हमारी इस संस्कृति में? फिर हम उसी रामायण-महाभारत के काल मे चलते है जहाँ देखने को मिलेगा राजकुमारियों के लिए स्वयंबर की प्रथा थी। सीता ने राम को चुना राम ने सीता को नही। हर पिता चाहता है उसका दामाद बलशाली हो, समृद्ध हो चूंकि वो अपनी बेटी उसे दे रहा है तो उसकी सुरक्षा अब पति की होगी इसलिए भी स्वयम्बर में बल प्रदर्शन की पद्धति रही है। राजकुमारी वरमाला लेकर लाइन से खड़े राजकुमारों के पास से गुज़रती थी जो उसे भा गया उसके गले मे वरमाला डाल देती थी। ये था भारतीय परंपरा में नारी शसक्तीकरण। वो केवल एक राजकुमार का चयन भर नही था अपितु सैकड़ो राजकुमारों का रिजेक्शन था। इतनी ताकतवर थी हमारी महिलाये। फिर आया मुगलों का राज। इस भारत देश मे उन्होंने देश की सशक्त महिलाओं को देखा। आश्चर्यजनक था उनके लिए और डर भी गए। अपने शाशनकाल मे दंभकारी नीतियों से महिलाओं को दबाया। उनमें से एक था दहेजप्रथा। कही कुछ ताकत से भी दबाया तो कुछ आसमानी किताबों के नाम पर। शोषण किया फिर कमजोर। सैकड़ो सालों में महिलाओं का आत्मबल तोड़ दिया। इतना कमज़ोर कर दिया कि उन्हें एक सहारे की जरूरत पड़ने लगी। कभी पिता तो कभी भाई और कभी पति।

आज महिलाओं को सशक्त करने के लिए सैकड़ो अभियान चल रहे है कुछ सरकारी तो कुछ गैर-सरकारी। ये बहुत सुखद भी है हम महिलाओं को फिर से उनकी ताकत का स्मरण करा रहे है। आज महिला हनुमान है तो पुरुष जामवंत की भूमिका में है। लेकिन सशक्तिकरण के नाम पर जो व्यापार हो रहा उसका आने वाले समय मे परिणाम बहुत ही हानिकारक है। हम अपनी बेटियों बहनों को सशक्तिकरण के उस आग में झोंक रहे है जहाँ वो सीता की तरह पवित्र नही، बल्कि होलिका की तरह जल कर भस्म हो जायेंगी।

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