भारत

भारत-जर्मनी के बीच व्यापक प्रवासन और गतिशीलता साझेदारी पर हुआ समझौता

नई दिल्ली- 05 दिसंबर। भारत और जर्मनी के बीच सोमवार को व्यापक प्रवासन और गतिशीलता साझेदारी पर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। गतिशीलता समझौते से लोगों के लिए एक दूसरे के देश में पढ़ना, शोध करना और काम करना आसान हो जाएगा।

जर्मनी की विदेश मंत्री अन्नालेना बेयरबॉक आज दो दिवसीय यात्रा पर नई दिल्ली पहुंची। उन्होंने यहां विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ द्विपक्षीय वार्ता की। वार्ता के बाद दोनों नेताओं ने साझा प्रेसवार्ता को संबोधित किया। इसी दौरान समझौते से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर हुए और करार आदान-प्रदान किए गए।

बैठक के बारे में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि आज की द्विपक्षीय वार्ता में आपसी संबंधों को उच्च स्तर पर ले जाने के हमारे पारस्परिक हित को रेखांकित करती है। उन्होंने जर्मनी की विदेश मंत्री के साथ विभिन्न विषयों पर व्यापक बातचीत की। हमारी रणनीतिक साझेदारी राजनीतिक आदान-प्रदान, निरंतर बढ़ते व्यापार, अधिक निवेश और लोगों के बीच मजबूत होते संबंधों के बल के कारण पिछले दो दशकों में अधिक मजबूत हुई है।

जर्मनी की विदेश मंत्री अन्नालेना बेयरबॉक ने कहा कि भारत दुनिया के कई देशों के लिए रोल मॉडल है। दोनों लोकतंत्र के बीच घनिष्ठ संबंध हैं। यह साझा मूल्यों, मानवाधिकारों, स्वतंत्रता, कानून आधारित व्यवस्था तथा लोकतंत्र पर विश्वास पर आधारित हैं।

जयशंकर ने कहा कि जर्मनी यूरोपीय संघ में हमारा सबसे बड़ा भागीदार है। हम आज व्यापार, निवेश और भौगोलिक संकेतकों पर भारत-यूरोपीय संघ वार्ता का समर्थन कर रहे हैं। हमें आशा है कि इसमें अच्छी प्रगति होगी। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर तीसरे दौर की वार्ता अभी-अभी समाप्त हुई है।

विदेश मंत्री ने इस दौरान वीजा पाने में हो रही देरी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि हमारे बीच बातचीत से आशा है कि आने वाले महीनों में समाधान निकलेगा और बैकलॉग खत्म होगा।

विदेश मंत्री ने अपनी जर्मन समकक्ष से वहां के प्रशासन की केयर में रह रही छोटी बच्ची अरिहा का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि हमारी चिंता बच्ची को मिल रहे भाषाई, धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश को लेकर है। हमारा दूतावास इस संबंध में काम कर रहा है। वहीं जर्मन विदेश मंत्री इस पर कहा कि उनकी दो बेटियां हैं। वे आश्वस्त करती हैं कि अरिहा ठीक है। बच्ची की भलाई को पहली प्राथमिकता दी जा रही है।

द्विपक्षीय वार्ता के दौरान महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी दोनों नेताओं ने अपने साझा दृष्टिकोण की समीक्षा की। जर्मनी की विदेश मंत्री ने कहा कि दुनिया की वर्तमान स्थिति चुनौतीपूर्ण है और ऐसे समय में एक-दूसरे के साथ खड़े होना बड़ा महत्व रखता है। इस वर्ष हमारे संबंध काफी प्रगाढ़ हुए हैं और कई बार उच्च स्तरीय मुलाकातें हुए हैं। यह दर्शाता है कि हमारे बीच एक घनिष्ठ समन्वय है।

उन्हें खुशी है कि भारत जी-20 अध्यक्षता के दौरान ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ के आदर्श वाक्य के साथ जलवायु संकट से निपटने पर विशेष ध्यान दे रहा है। जलवायु परिवर्तन का मुद्दा हमारी साझी जिम्मेदारी पर प्रकाश डालता है।

विदेश मंत्री ने बताया कि हमने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया। इसमें यूक्रेन संघर्ष, हिन्द-प्रशांत सामरिक स्थिति शामिल रही। अफगानिस्तान और पाकिस्तान से संबंधित घटनाक्रम और कुछ हद तक ईरान सीरिया पर अपने दृष्टिकोण साझा किए। यूक्रेन के मुद्दे पर भारत का रुख स्पष्ट है कि यह युद्ध का युग नहीं है और संघर्ष को बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। इसमें संबंधित पक्षों पर फैसले को छोड़ दिया है।

उन्होंने कहा कि कई मामलों पर एक दूसरे के दृष्टिकोण को जानना फायदेमंद रहा। उन्होंने बताया कि हमने कई मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। भारत और जर्मनी जी-4 फ्रेमवर्क में भी इंटरेक्ट कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधार की बात आती है तो भारत और जर्मनी जी-4 के ढांचे में बातचीत करते हैं। उन्होंने भारत-प्रशांत महासागरीय पहल में जर्मनी के भाग लेने का स्वागत किया।

दोनों देशों की बातचीत में पाकिस्तान का मुद्दा भी उठा। जयशंकर ने बताया कि पाकिस्तान के संबंध में हमने अपना रुख अपनी समकक्ष के सामने रखा। सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे पर हमने अपनी स्थिति को स्पष्ट कर दी। उन्हें बताया गया कि ऐसे समय में बातचीत संभव नहीं है और जर्मनी भी हमारे इस रुख से सहमत है।

रूस के विषय पर विदेश मंत्री ने कहा कि यूरोपीय देशों की तुलना में रूस के साथ हमारा व्यापार बहुत छोटे स्तर पर है। उन्होंने कहा कि यह 12 से 13 अरब डॉलर हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि किसी भी व्यापारिक देश के व्यापार को बढ़ाने की वैध अपेक्षाओं के अलावा रूस के साथ व्यापार के मुद्दे पर कुछ अधिक समझा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “यूरोप अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता देने में कोई विकल्प नहीं चुनता, लेकिन भारत से कुछ और करने के लिए कहता है।”

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