
पपीते की खेती से आर्थिक स्थिति संवार संजय सिंह बने प्रेरणास्रोत
मोतिहारी- 07 मार्च। पेट्रोलियम पदार्थों के साथ उर्वरको की बढती महंगाई ने किसानों की कमर तोड़ने में कोई कसर नही छोड रखी है। ऐसे में जिले के कुछ किसान ऐसे भी है जो परंपरागत गन्ना धान व गेहूं की खेती छोड़ अन्य नकदी फसल की ओर रुख करना शुरू कर दिया है।
इसी कड़ी में पूर्वी चंपारण जिले के पकड़ीदयाल प्रखंड स्थित नवादा श्रीपुर गांव के किसान संजय कुमार सिंह है। जो पपीते की खेती कर न सिर्फ अपनी आर्थिक हालात को सुदृढ़ किया है,बल्कि जिले के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा के स्रोत बन गये है।उन्होंने तीन साल पूर्व पपीते की खेती की शुरूआत की थी।आज उनके पास लगभग तीन एकड़ में पपीते के बाग हैं। उन्होंने बताया कि वे जैविक तरीके से पपीते की खेती कर रहे हैं ताकि हमारे बगीचे के उत्पाद का प्रयोग करने वाले को स्वास्थ्य से संबंधित कोई परेशानी न हो।
उन्होंने बताया कि एक एकड़ में पपीता लगाकर किसान प्रतिवर्ष ढाई लाख रुपये कमा सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार के दावो के विपरीत उन्हें कोई सरकारी अनुदान नहीं मिला है। हालांकि किसान चाहे तो सरकार की ओर से पपीते की खेती के लिए मिल रहे अनुदान का लाभ उठा सकते है। उन्होंने बताया कि एक पेड़ में औसतन 60 किलो पपीता का फल मिल जाता है और व्यापारी उनसे 20 रुपये प्रति किलो के हिसाब से खरीद कर ले जाते हैं। नवादा श्रीपुर गांव पहुंचते ही संजय सिंह के बारे में पूछने पर लोग पपीते वाले संजय सिंह बारे में बताते हैं। वे पूरे गांव ही नहीं प्रखंड में भी पपीते वाले संजय सिंह के नाम से विख्यात हो चुके हैं।
संजय सिंह ने बताते है कि एक बार जिला बागवानी पदाधिकारी यहां पहुंचे जरूर थे,लेकिन सरकारी मदद नहीं पहुंची। उन्होंने कहा सरकार किसानों को पपीते की खेती के लिए प्रोत्साहित तो कर रही है लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों को उत्साहवर्धन करने की बजाय हतोत्साहित किया जाता है। हालांकि जिला बागवानी पदाधिकारी इस बात से इनकार करते हैं। वो कहते हैं कि किसान आवेदन करके उनसे यह लाभ ले सकता है। उन्होंने पपीता ही नहीं अन्य फल व सब्जी के उत्पादन के लिए भी सरकारी सहायता उपलब्ध होने की बात कही। सबसे बड़ी बात यह है कि जिले में पिपरा कोठी स्थित राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र किसानों के लिए स्थापित तो किया गया है,लेकिन यह संस्थान किसानों की बजाय कुछेक नेताओं के आसपास घुमती नजर आती है।अगर ऐसे संस्थान नेताओं के महिमामंडन को छोड यहां किसानों को प्रोत्साहित करने पर जोर दे,तो जिले के किसान और बेहतर कर सकते है।



