क्यों में यहां आई हुं? :अंजली

क्यों में यहां आई हुं?

हंसती खेलती जिंदगी मेरी…
बड़ी मैं अब होने लगीं हूं…
स्कूल छोड़, कॉलेज में क़दम रखे है मैने..
पापा का नाम ऊंचा, करने मैं आयी हुं।

दोस्त कहां बने है नए मेरे..
पढ़ने के साथ, नया सीखने की आस है मुझ में..
समाज का नया नज़रिया.. देखने में चली आयी हुं।

लोगो को देखा है मैने..
क्या देखते है, क्या सुनते है, और क्या ही वो कहते है…
अपने आप को बचाने…
साथ बहुत सी उम्मीदों के सामने मैं.. आपके आई हुं।

परेशानी मे रहती हूं मैं… एग्जाम मेरे आए है..
Top करने की चाह है मुझमें..
पर अगर नहीं कर पाई तो…
कौन समझाएगा मुझे.. पूछने मैं आई हुं।

करियर मुझे बनाना है.. आगे मुझे बड़ना है..
जिम्मेदारियां मुझ पर आई है..
लोगो ने तो बस हंसी ही दिखलाई हैं..
हौसला टूट जाता हैं मेरा..
कौन संभालेगा मुझे.. समझने मैं आई हुं।

प्यार भी अजीब खेल खेलने लगा है…
इसकी भी बहुत फरमाइशें होने लगी है..
सब पूरी हो, जरुरी तो नहीं.. बतलाने मैं आई हुं।

पढ़ाई बहुत की है मैने.. फ़िर भी टूट जाती हुं..
दुनियां को समझाते समझाते, सबको मैने समझा है…
कोई मुझे समझेगा…. देखने में आई हुं।

मेरे emotions है, मेरी feelings है…
मेरे dicisions है, मेरी needs हैं..
लेकिन अफ़सोस….
मेरी सांसे तो है… पर साथ नहीं है…
सब कुछ मैं कर सकतीं हुं पर..
मुझे पकड़ने के लिए कोई हाथ नही है।

हाथ है मगर, उंगलियां उठाने के लिये..
कोई समझने को तैयार नहीं है…

मैं घिर जाती हू, अंधेरे में.. परम्पराओ की जंजीरों में…
जानवरों की भूख में, तो कभी शिकारियों के पिंजरे में..

मुझसे आके पूछो तो सही…
मेरी बातें सुनो तो सही…
साथ देने का वादा करो तो सही..
मैं अपनी परेशानियां बताने आई हुं।

मैं हंसते खेलते जीवन को छोड़कर..
मरने ऐसे चली आई हुं….
मम्मी, पापा, समाज, दोस्तो..
कोई बचाओ मुझे.. कोई समझाओ मुझे..
कोई संभालो मुझे… कोई समझो मुझे..
मैं क्यों यहां suicide करने आई हुं।

कवियत्री :अंजलि

lakshyatak
Author: lakshyatak

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